Poemकविता
मेरे कितने घर होंगे?
मेरे कितने घर होंगे?
एक घर होगाजो पिता ने बनाया होगा,एक वह घर होगाजो मैंने बनाया।क्या ये मेरे घर होंगे?
नहीं होंगे,तो एक सरकारी मकान होगा—वह घर कभी नहीं होगा।हालाँकि अपने ड्राइवर कोदफ़्तर से घर चलने के लिए बोलकरएक जगह अवश्य जाता हूँ।
पत्नी का घर घर नहीं होगा,उसका मन होगा।उसके मन का एक कोना होगा,जिसमें वह एक खलिहान पोतेगी,नीम लगाएगीऔर एक खटोला तानेगी।
उसके मन का वह कोनाएक घर होगा,जिसका मैंसिर्फ़ किरायेदार ही बन पाऊँगाऔर खर्च होता जाऊँगा।
माँ के मन का घर,जो मेरी सबसे प्यारी जगह थी,अभी भी खुले दरवाज़ों सेमुझे बुलाता है—लेकिन मैं जा नहीं सकता,और जा नहीं पाता,और इसका कोई तर्कमेरे पास नहीं है।
पिता के मन के घर सेएक बार निकलकरवापस नहीं जाया जा सकता।उसे छोड़नाऔर लौटकर कभी न देखनाआदमी होने कीअनिवार्य शर्त है।
तो अंततः बेघर मैं,ताउम्र अपने मन के घर की इमारत कोबनाता और ढहाता रहूँगा।
मैं चाहता हूँमेरे मन के कोने मेंमेरा एक घर हो—जहाँ अपनी समस्त वैयक्तिकता,अपने दो जोड़ी कपड़े,अपनी किताबें,अपनी खाटऔर अपनी लाठी के सहारेखड़ी रहे।
इस घर की खिड़कियों सेमैं देख सकूँमाँ के घर को,छुपकर उतर सकूँपत्नी के आँगन में,और रात के पहर-दो पहरपिता के घर की भीआहट ले लूँ